अब तो तन्द्रा टूट जानी चाहिए जवाबदारों की
मन्दसौर। ‘‘हमारी जीवन दायिनी माँ शिवना की दुर्दशा’’ इस वाक्य में प्रथम 2 शब्द जीवन दायिनी और अंतिम शब्द दुर्दशा लगभग 3 दशकों से कहे सुने जाने वाले इन दोनों शब्दों को विलोपित करने में ही सार है क्योंकि जिसे जीवन दायिनी कहते-कहते जबान थक गई उस मॉ शिवना का स्वयं का जीवन ही नहीं रहा तो हमें जीवन कहां से देगी और यह दुर्दशा शब्द भी घिसा पीटा, बहुत छोटा लगने लगा है। अब तो शब्द कोष में इससे भी बढ़कर शब्द खोजना पड़ेगा जो मॉ शिवना की हकीकत दशा को दर्शा सकें। वैसे देखा जाये तो मॉ शिवना की नहीं हम हमारी अपनी दयनीय दुदर्शा को दर्शा रहे है दुनिया के सामने क्योंकि संसार में दशपुर नगर को विश्ववन्द्य भगवान श्री पशुपतिनाथ की पवित्र नगरी के रूप में गौरव प्राप्त होने पर जब बाहर के दर्शनार्थी यात्री भगवान पशुपतिनाथ के दर्शनोपरान्त मॉ शिवना के दर्शन करते हांेगे तब इस पवित्र नगरी का क्या संदेश लेकर जाते होंगे।
पतंजली योग संगठन के जिला प्रभारी बंसीलाल टांक ने अपनी पीड़ा, व्यर्था व्यक्त करते हुए कहा कि इससे बढ़कर मॉ शिवना के प्रति उदासीनता-अकर्मण्यता और क्या होगी कि दशकों से जीवन दायिनी कही जाने वाली मॉ शिवना के जल का आंचमन तो दूर स्नान तक करने में हिचकिचाहट होती है।
मॉ शिवना को शुद्ध करने का अभियान 1-2 नहीं बल्कि 15-16 वर्षों से गायत्री परिवार तथा नगर के अन्य सामाजिक संगठनों द्वारा लगातार किया जाता रहा है। सरकारी-स्थानीय शासन स्तर पर हर वर्ष योजनाएं बनती रही परन्तु सब ढाक के तीन पात साबित होती रही। जिम्मेदारों को कुंभकर्णी तन्द्रा से जगाने के लिये इसी वर्ष फरवरी में भयंकर कड़कड़ाती घने कोहरे में खून जमाती ठण्ड में गायत्री परिवार के बैनर तले सामाजिक संगठनों द्वारा लगातार 2 माह तक प्रति रविवार कमर से उपर छाती तक शिवना जल में खड़े रहकर जल सत्याग्रह किया था, इतना ही नहीं जिम्मेदारों को सचेत करने हेतु शिवना में ही हवन भी किया। नपाध्यक्ष श्री रामजी कोटवानी ने स्वयं जल में खड़े रहकर मॉ शिवना के शीघ्र उद्धार के लिये आश्वासन देकर सत्याग्रह स्थगित करवाया था, विश्वास भी था परन्तु पहली बाढ़ में ही खानपुरा का गन्दा नाला शिवना में जा मिला और जहां से चले थे वहीं पहुंच गये। मिसाल सिद्ध हो गई दिन भर चले अढाई कोस परन्तु उसके पश्चात् आश्चर्य तो उस समय हुआ जब जो शिवना लगभग 3 दशकों से स्वयंसेवी संस्थाओं एवं सरकारी प्रयासों के बाद भी शुद्ध नहीं हुई थी वह कोरोना में 2 माह तक लॉकडाउन रहने से इतनी निर्मल, पवित्र, शुद्ध हो गई थी कि पशुपतिनाथ घाट पर शिवना में स्नान ही नहीं आचमन और सूर्यनारायण को मंत्रों के साथ अर्ध्य करते देखा गया था, परन्तु जैसे ही लॉकडाउन समाप्त हुआ नगरवासियों ने चाहे अपने को बंधन मुक्त समझ कर खुशियों के दीप जलाये हो परन्तु वही निर्मल शुद्ध पवित्र जीवन दायिनी मॉ शिवना ने लॉकडाउन खुलने के बाद कुछ महिनों में ही पुनः भयंकर गंदगी के अंधेरे में गुम होकर अपने भाग्य पर आंसू अवश्य बहायें होगे। और बहाये भी क्यों नहीं जब उसकी गोद में उसके स्वच्छ निर्मल जल में अठखेलियां करने के बजाय तड़फती मछलीयां दम तोड़ती और महिलाओं का विशेष स्नान मास कार्तिक समाप्ती कार्तिक पूर्णिमा पर ग्रामीण और नगर की मॉ बहिनों को कार्तिक मास पर्यन्त व्रत कार्तिक उपवास के पश्चात् पूर्णिमा पर संध्या को उसके गन्दे जल में टाटीयां अर्पण करने को मजबूर होना पड़े तब जिम्मेदार संजयों की दिव्य दृष्टी यह सब कुछ नहीं देखपायी हो परन्तु मॉ शिवना अपने आंचल में यह सब कुछ कैसी छिपा सकती थी, आखिर प्रकट होना ही था जो हो ही गया।
यह तो गनीमत रही कि कोरोना की वजह से इस बार पशुपतिनाथ मेला स्थगित हो गया नहीं तो जहां हजारों की संख्या में क्षेत्र व बाहर के दूर-दूर से दर्शनार्थी मेले में आते है उनकी भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन और मॉ शिवना की मनमस्तिष्क को आहत करने वाली भयंकर दुर्दशा को देखकर इस पवित्र घोषित नगरी के प्रति क्या संदेश लेकर जाते। समय की मांग है अब तो जवाबदारों को चेत जाना चाहिए नहीं तो फिर अन्ततः भोलेनाथ से ही गुहार लगाना पड़ेगी कि ‘‘भोले मेरी शिवना मैली हो गई, नगर की गंदगी ढोते-ढोते। लॉकडाउन में हुइर्ं्र थी स्वच्छ निर्मल, फिर लाल हो गई किस्मत पर अपने रोते-रोते।’’

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