उड़ती फिरती नभ में
सतरंगी पतगों को देख
हम भी उड़ाने भरना चाहते है।
कर्म और धर्म क्षेत्र में
अपने अपने मापदंड तय कर तटस्थ हो जाते है,
जब तक उडाने रहती है,
अन्तर्मन के डोर की
स्वप्न संजोते संजोते
आनंद की उडाने भरते जाते है
सच तो यह है कि जब तक
मन की लहरों की ये उड़ानें
कोशिश बनकर बरकरार रहती है
तब तकजिंदगी की ये पतगें
जीवन में उल्लास के रंग
तितलियों सी भरती उड़ती फिरती है,
जिस पल जरा सा भी आया
झौंका हवा का
ये पतगें मन की खुशियों पर
लगाते हुए ग्रहण
जिंदगी की डोर से कट कर
बहुत दूर चली जाती है
और ज़िंदगी हंसते-हंसते
तिनके तिनके सी बिखर जाती है।
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लाल बहादुर श्रीवास्तव
शब्द शिल्प
एल आई जी A15जनता कालोनी
मंदसौर 9425033960
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