कविता
सर्द शीत लहर में.........
इस कंपकपाती सर्द शीत लहर में
तन पर इनर,स्वेटर जर्कीन कोट
उस पर शाल टोपा लगांए चैकस,
फिर भी ठंण्ड की ठिठुरन से हम
थर-थर कांप रहें है ?
वहीं सड़क के दोनो और
मजदूर के परिवार अधमुंहे बच्चों संग माॅ
बेफ्रिक होकर मस्तमौला जिंदगी
गुजारते नजर आ रहें है।
न घर ना आशियाना
तन पर वही दो जोड़ी कपड़े जो
भीषण गर्मी की तपन में
पसीने से भीगे कभी तरबतर थे
शायद उसकी आग अभी भी
इनके जिस्म में जैसे जिंदा है ।
लकड़ियाॅ बिनते अलाव तापते
यही तो इनका इलेक्ट्रिक हीटर है ?
न जाने इतनी उष्मा - उर्जा अपार शक्ति
कहां से ये लाते है ?
असल में ये स्वयं ही अपनी जीवटता के
शक्तिमान है
छल , प्रपंच, आडम्बर से कोंसो दूर
मेहनतकश मजदूर, श्रम के सच्चे साधक है
जब तक रजाईयों में मुंह छिपाएं
सर्दी में हम सिसक रहे होते है
तब तक तड़के उठते ही पहली किरण के साथ
हसते मुस्कराते दानकी तिहाड़ी पर
रोज की तरह निकल पडंते है
लाल बहादुर श्रीवास्तव
शब्द शिल्प एलआईजी ए - 15
जनता काॅलोनी मंदसौर
मो0 9425033960



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