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स्वयं स्वीकृत बलिदानी दधीचि का अवतार गुरु तेग बहादुर- guru tegbahadur

अनेक धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से मिलकर बनी है भारत की संस्कृति!



धार्मिक और पारंपरिक स्तर पर अत्याधिक भिन्नता होने के बावजूद भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहां सभी धर्मों को बराबर मान-सम्मान एवं अधिकार दिया जाता है लेकिन पहले ऐसा नहीं था, क्योंकि तब अधिकार केवल युद्ध और बलिदानों पर ही निर्भर होते थे यही वजह है कि यहां समय-समय पर विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा आक्रमण और जीत-हार दर्ज की जाती रही। अंग्रेजी शासन आने से पहले यहां राजकीय स्थिरता जैसी कोई बात नजर नहीं आती थी, अपने अपने धर्म और पंथ की स्थापना के लिए आक्रमण और अतिक्रमण जैसे माहौल के बीच यहां शासन की बागडोर संभाली जाती थी, लेकिन जब धर्म के नाम पर मरने-मिटने की बात आती है तो सिख समुदाय का नाम हमेशा ही सम्मान के साथ लिया जाता है । सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर ऐसी ही एक शख्सियत हैं जिन्होंने सिख धर्म के सम्मान को बरकरार रखने के लिए अपनी जान की भी कोई परवाह नहीं की।
गुरु हरगोविन्द सिंह के पांचवें पुत्र, गुरु तेग बहादुर का जन्म कृष्ण पक्ष की वैशाख पंचमी संवत 1678 (ईसवी सन 1621) को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था, सिखों के आठवें गुरु ‘हरिकृष्ण राय जी’ की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा गुरु तेगबहादुर को गुरु बनाया गया था। गुरुतेग बहादुर के बचपन का नाम त्यागमल था, 14 वर्ष की छोटी सी आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने तलवार का कौशल दिखाकर जो वीरता का परिचय दिया था, उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेगबहादुर (तलवार के धनी) रख दिया।
उन दिनों औरंगजेब का अत्याचार अपने चरम पर था, वह तलवार की ताकत पर भारत के हिंदुओं को इस्लाम कुबूल कराने का दिवास्वप्न देख रहा था उस समय के इस्लामिक धर्म गुरुओं ने औरंगजेब के दिमाग में एक बात यह जमा दी थी कि हिंदुओं को यदि मुसलमान बनाना है तो इनके धर्म गुरु और ब्राह्मणों को यदि मुसलमान बना लिया जावे तो इनके पीछे हजारों हिंदू, इस्लाम कबूल कर लेंगे। इसी भ्रांति के कारण औरंगजेब के अत्याचार हिंदुओं पर बढ़ते जा रहे थे ,उसके कार्यकाल में भारत के हजारों हिंदू मंदिरों को नष्ट किया गया, वहां की मूर्तियों को विकृत किया गया, मथुरा के मंदिर को तोड़कर उसका नाम इस्लामाबाद करने के आदेश दिए गए, हिंदुओं पर जजिया कर लगा दिया गया, सरकारी नियुक्तियों में हिंदुओं को लेना बंद कर दिया गया इतना ही नहीं उदारवादी मुसलमान सूफी संतो को भी मौत के घाट उतार दिया गया।
औरंगजेब के इस दमन चक्र के विरुद्ध चिंगारी उठने लगी। मथुरा का मंदिर तोड़ने वाले फौजदार को वहां के जाटों ने मार डाला एवं बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल एवं दक्षिण के छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब को नाकों चने चबवा दिए।
इन्हीं दिनों सन 1971 में सूबेदार इफ्तिखार खान ने कश्मीरी पंडितों पर सितम की इम्तिहाँ  कर दी उसने  अनेक ब्राह्मणों को इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य किया  किंतु इतिहास इस बात का गवाह है कि 70 लाख जनेऊ का बंडल जब औरंगजेब को दिया गया तो वह बड़ा खुश हुआ किंतु दूसरे क्षण जब यह कहा गया कि ब्राह्मणों ने  अपनी जनेऊ एवं धर्म के लिए सिर कटवाना स्वीकार किया किंतु इस्लाम कबूल नहीं किया तो वह बहुत चिंतित हुआ। इस अत्याचार से दुखी होकर करीब 500 कश्मीरी पंडित आनंदपुर की ओर चल दिए जहां गुरु तेग बहादुर रह रहे थे।
पंडितों की करुण गाथा सुनकर उन्होंने अनुभव किया कि सदियों से निराश समाज को कैसे जागृत किया जाए इसलिए एक प्रकाश स्तंभ की आवश्यकता महसूस की गई इसी बीच उनका बालक गोविंद राय ने उनकी चिंता का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि जिस प्रकार भगवान शंकर ने जहर पीकर अथवा दधीच ऋषि ने राक्षसों के वध के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था ठीक वैसा ही बलिदान किसी महापुरुष को देना पड़ेगा तब ही हिंदू समाज में जागृति आएगी यह सुनकर बालक गोविंद राय ने कहा की आप से बढ़कर कौन महापुरुष हो सकता है? इस बात पर गुरु तेग बहादुर को दिशा मिल गई उन्होंने ब्राह्मणों से कहा कि तुम औरंगजेब को यह कह दो कि यदि तेग बहादुर मुसलमान बन जाएंगे तो हम सभी मुसलमान बन जाएंगे। जब यह खबर औरंगजेब को मिली तो उसने तीन शर्ते रखी की कलमा पढ़ कर मुसलमान बन जाओ या कोई चमत्कार दिखाओ अन्यथा मौत को स्वीकार करो गुरु जी ने अंततः मौत को स्वीकार किया इस मौके पर उनके साथ 5 सिख, भाई मती दास ,दयालदास ,सती दास, भाई गुरु दत्ता और भाई जेता उनके साथ थें।
उक्त सिखों में पहले 3 को  मौत के घाट उतार दिया गया और 11 नवम्बर 1675 को जल्लाद जलालुद्दीन ने नंगी तलवार से गुरुजी का सर धड़ से अलग कर दिया।
यहां एकत्रित जन समुदाय चित्कार रहा था और प्रकृति के क्रोध से अचानक तेज आँधी चलने लगी इस स्थिति का लाभ लेकर भाई जैता ने अपने पिता की आज्ञा से अपने ही पिता का सिर काट कर वहां डाल दिया और विद्युत गति से गुरुजी का सिर ले भागे, इधर भाई लक्की शाह के 8 बेटों ने शाही रसद की गाड़ी में गुरु जी के धड़ को छुपाया और ले भागे रायसीना (दिल्ली का ही क्षेत्र) अपने घर गुरुजी का सिर आनंदपुर में चंदन की चिता में पूर्ण सम्मान के साथ समर्पित कर दिया गया है किंतु गुरुजी के धड़ को लक्की शाह ने अपने घर में ही रायसीना पहुंचकर अग्नि को समर्पित कर दिया ताकि औरंगजेब की सेना उस तक नहीं पहुंच सके।
इस अद्भुत देश भक्ति को देखकर मुसलमान सहित हिंदू समाज भी दंग रह गया एक मुसलमान फकीर ने औरंगजेब को पत्र लिखा कि हे बादशाह ! यह तूने अच्छा काम नहीं किया है इसके परिणाम भयानक होंगे और तू जीवन भर चैन की नींद नहीं सो सकेगा।
जिस स्थान पर गुरु तेग बहादुर का वध हुआ था वहां बाद में वध स्थल पर चांदनी चैक दिल्ली में गुरुद्वारा शीशगंज बनाया गया तथा रायसीना के उस घर जहां देह का अंतिम संस्कार हुआ था, के स्थान पर गुरुद्वारा रकाबगंज का निर्माण किया गया।
गुरु जी के बलिदान से उस समय के भारत में नवीन उत्साह का संचार प्रारंभ हुआ और स्थान स्थान पर मुगलों के अत्याचार के विरुद्ध गांव  गांव मे लोग संगठित होकर हथियारों से उनका मुकाबला करने लगे ।
यदि इतिहास का ठीक से अध्ययन किया जाए तो गुरु तेग बहादुर का बलिदान उस समय, ‘समय की मांग’ बन गया था और सोते हुए समाज को जगाने का शायद इससे अच्छा कोई और तरीका नहीं बचा था।
आज वैशाख पंचमी के दिन उनके प्रकाश पर्व के अवसर पर हम गुरु जी के चरणो में श्रद्धा पूर्वक नमन करते हैं।
(रमेशचन्द्र चन्द्रे)

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