राष्ट्रहित में नागरिकता कानून (सीएए) विरोध पर लग जाना चाहिए विराम- शरण में आये शरणागत को शरणागति (नागरिकता) प्रदान करना अनादिकाल से संवैधानिक परम्परा है भारत की-सबको होना चाहिये शिरोधार्य
(बंशीलाल टांक)
नागरिकता संशोधन कानून सीएए और एनआरसी के विरोध में देश में जो हो हल्ला हो रहा है उससे पूरे देश का माहौल किस प्रकार गड़बड़ाया है यह किसी से छुपा नहीं है। जहां तक सीएए का सम्बन्ध है लोकसभा के बाद राज्यसभा में बहुमत से पारित होकर महामहिम राष्ट्रपति की मोहर लगने के बाद विधिवत कानूनन देश में लागू होने और बुद्धिजीवियों-कानून विदों द्वारा इसका जो समर्थन करने के बावजूद इसका विरोध किया जा रहा है, क्या वह उचित है ?
नागरिकता कानून कोई नया नहीं है। पूर्व से लागू है केवल इसकी समय सीमा को घटा दिया गया है और वह भी केवल 6 माह कम किये है। 2014 से पहले से रह रहे जो शरणार्थी भारत में बस गये है उन्हें ही नागरिकता दी गई है इसमें क्या बुराई है ?
जहां तक शरण में आये शरणागत को शरणागति (नागरिकता) प्रदान करने की परम्परा है वह आज के आधुनिक युग कलियुग की नहीं भारत की लाखों वर्ष पुरानी है। त्रेता युग में अयोध्या के राजकुमार राम की भार्या सीता का अपहरण कर रावण लंका ले गया और राम ने जब लंका पर चढ़ाई की तब युद्ध से पहले पाकिस्तान से आये प्रताड़ित अल्पसंख्यकों की तरह लंका नरेश रावण से प्रताड़ित विभीषण राम की शरण में आया तब मंत्री सुग्रीव द्वारा एक कट्टर दुश्मन रावण का भाई होने के नाते गुप्तचर बन कर कहीं भेद लेने न आया हो इसलिये उसे शरण देने के बदले बन्दी बनाना उचित बताया तब राम ने राजनीति के मान से मंत्री सुग्रीव की सम्मति का समादर करते हुए कहा कि चूंकि विभीषण राम की शरण की प्रार्थना लेकर आया है और शरण में आने वाले को शरणागति प्रदान करना भारत की सनातन परम्परा है जिसका पालन करना प्रत्येक भारतवासी का प्रथम कर्तव्य है और भारत को इसी सनातन महान परम्परा का पालन करते हुए राम ने विभीषण को ठुकराया नहीं केवल शरणागति प्रदान ही नहीं की बल्कि लंका नरेश के रूप में सम्मान दिया।
शरण में आये हुए को जो शरणागति नहीं देता उनके सम्बन्ध में राम ने जो कहा जिसे तुलसीदासजी ने रामचरित मानस में जो कहा है शरण में आये को शरणागति (नागरिकता) का विरोध करने वालों को गौर करना चाहिए। रामचरित मानस के पंचम सोपान सुन्दर काण्ड में दोहा क्रमांक 43 में स्पष्ट उल्लेख है कि ‘‘शरणागत कहुंजे जो तजहिं निज अनहित अनुमानी। ते नर पामर पापमय तिनही विलोकत हानी।’’ अर्थात जो अपनी हानि का अनुमानक शरण में आये हुए को शरणागति (नागरिकता) प्रदान नहीं करते हुए त्याग देता है ऐसा व्यक्ति नीच और पापी नही नहीं बल्कि पाप का भण्डार माना गया है। जिससे सम्पर्क-संवाद तो दूर उसे देखने मात्र से अपनी हानि होती है।
राम ने तो 9 लाख वर्ष पूर्व कहा था परन्तु वर्तमान युग के महान विचारक युग प्रवर्तक युग वेता स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका के शिकांगों की विश्व धर्मसभा में जो शरणागत की विश्व धर्मसभा में शरणागत के संबंध में जो कहा था और जिसका विवेकानन्द जयंती पर हाल ही में 12 जनवरी को सूर्य नमस्कार से पूर्व म.प्र. सरकार द्वारा समस्त आकाशवाणी केन्द्रों से प्रसारित किया गया स्वामी विवेकानन्द ने कहा था शरण में आये शरणागतों को शरणागति प्रदान करना भारत की महान संस्कृति रही है। जिसका पालन सबको करना चाहिए। और जब यह स्पष्ट है कि नागरिक संशोधन का यह कानून किसी भी भारतीय की नागरिकता छीनने वाला नहीं बल्कि देने वाला है तो फिर इतनी खुली सीधी बात गुमराह करने वाले, भ्रमित करने वाले, सियासत करने वालों और उनके बहकावे में भ्रमित होने वालों के समझ से परे क्यों हो रही है जिसका दुष्परिणाम तोड़-फोड़, आगजनी, रोड़ जाम, हिंसात्मक कार्यवाहीयों को जो अंजाम दिया गया उससे कौन सा राष्ट्र का भला हो रहा है। महिलाओं के माध्यम से दिल्ली शाहीन बाग में 37 दिन से धरना से आम लोगों को तो परेशानी हो ही रही है सबसे ज्यादा परेशानी उन विद्यार्थियों को हो रही है जिनकी परीक्षाएं चल रही है। दिल्ली को शाहीद बाग की तरह देश का अन्य प्रांतों उ.प्र., के लखनऊ, रााजस्थान के जयपुर, बिहार आदि के ताजा उदाहरण है।
नागरिकता संशोधन का जो कांग्रेस सहित राजनैतिक दल विरोध कर रहे है उनमें म.प्र. में सत्तादल कांग्रेस के सुवासरा विधायक श्री हरदीपसिंहजी डंग तथा पूर्व विधायक मुख्यमंत्री श्री दिग्विजयसिंह के भाई विधायक श्री लक्ष्मणसिंहजी ने भी नागरिकता संशोधन कानून जिसमें भारत में रहने वाले किसी भी नागरिकता पर कोई विपरित प्रभाव नहीं पड़ने से नागरिकता कानून का विरोध का कोई औचित्य नहीं समझा अर्थात दूसरे शब्दों में इसका समर्थन किया है। कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता आदरणीय श्री कपिल सिब्बल ने भी चाहे बाद में बयानों में उलट फेर कर दिया हो परन्तु प्रारंभ में उन्होंने जो राज्य सीएए लागू करने से मना कर रहे है उनके संबंध में स्पष्ट कहा था ‘‘राज्य नागरिकता संशोधन कानून लागू करने से मना नहीं कर सकते। मना करना असंवैधानिक होगा अर्थात दूसरे शब्दों में सीएए संशोधन कानून संवैधानिक है। एक तरफ संवैधानिक और दूसरी तरफ संविधान बचाओ-देश बचाओं के नारे लग रहे हे।
जहां तक एनआरसी को लेकर विरोध हो रहा है जब प्रधानमंत्री स्पष्ट कर चुके है कि इसके लागू करने का कोई प्रस्ताव, कोई योजना फिलहाल नहीं है तो पहले से परेशान होने की क्या आवश्यकता है। न किसी की नागरिकता छीनी जा रही है और न एनआरसी-एनपीआर लागू की जा रही है तो फिर जबरदस्ती भ्रम फैलाकर-गुमराह करके आंदोलन जारी रखना, गुमराह-भ्रमित करके आंदोलन में महिलाओं को भी सहभागी बनाना, महिलाएं ही नहीं विरोध और सियासत की भी हद और अति तो तब हो गई जब फूल से कोमल स्कूली बच्चों के हाथों में तिरंगा और तख्तीयां थमाकर आगे कर दिया है और बच्चे हाथों में गुलाब के फूल देकर पुलिस वालों से कह रहे है’’ हम तुम्हारे साथ है’’। सोचने की बात है पुलिस वाले कहां सीएए का समर्थन अथवा विरोध कर रहे है जो बच्चे पुलिस वालों को गांधीवादी तरीके से फूल भेंटकर रहे है।
विरोध करने वालों को यह भी नहीं भूलना चाहिये कि 135 करोड़ के देश में जहां सैकड़ों आंदोलन कर रहे है वहां हजारों नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष शांतिपूर्वक समर्थन भी कर रहे है।
इसलिये देशहित में पाकिस्तान-बांग्ला-अफगानिस्तान से धर्म के आधार पर जो अल्पसंख्यक हिन्दू-सिक्ख-ईसाई-जैन-बोद्ध-पा रसी शारीरिक मानसिक रूप से प्रताड़ित किये जाकर नारकीय जीवन जीने को मजबूर थे और घबराकर भारत में शरण लेकर यहां के नागरिक कहलाकर और स्वाभिमान-सम्मान की जिन्दगी जीना चाहते है तो हमें तो खुशी-खुशी उनके सुख मेें शामिल होना चाहिए न कि पहले से दुखी और परेशान को ओर मानसिक पीड़ा पहुंचाना। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हम उस देश के वासी है जिस देश ने विश्व को आज से नहीं-आदि से यह संदेश दिया जाता रहा है ‘‘सर्वे भवन्तु सुखीनः, सर्वे सन्तु निरामयः। सर्वे भद्राणी पश्यन्तु-मॉ कश्चिद् दुःख भागभवते।’’ सभी सुखी हो-सभी स्वस्थ रहे- जहां जो भी देखे(सुने) श्रेष्ठ अच्छा ही देखे (सोचे विचारे) जिससे कभी किसी को दुःख नहीं पहुंचे।

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