‘‘गुरु‘‘ शब्द मात्र से जिस स्वरूप की परिकल्पना होती है कि जटा-जूट, रुद्राक्ष की माला, पितांबर एवं तन पर भस्म या चंदन लगाए हुए व्यक्तित्व को हमारे यहां ‘‘गुरुजी’’ शब्द से संबोधित एवं सम्मानित किया जाता है किंतु उक्त स्वरूप वाले गुरुजी सतयुग, त्रेता युग एवं द्वापर युग तक ही आध्यात्मिक एवं अलौकिक शिक्षा (रोजगारोन्मुखी) देते रहे थे किंतु इस युग में उक्त स्वरूप वाले गुरुजी, साधु- सन्यासी, संत एवं प्रवचनकार होकर वे केवल धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा तक ही सिमट गए किंतु वे लौकिक अर्थात जीविकोपार्जन अथवा आत्मरक्षा की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं करते है, किंतु प्रत्येक गुरु पूर्णिमा पर केवल उक्त प्रकार के स्वरूप वाले संत, महात्मा, साधु, सन्यासी एवं प्रवचनकारों की ही पूजा या सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं तथा यह आयोजन कभी-कभी तो गुरुजनों एवं उनके संस्थानों द्वारा भी प्रायोजित किए जाते हैं।
यह भी सत्य है कि हर युग में गुरु जन अध्यात्म एवं धर्म की शिक्षा के साथ-साथ आत्मरक्षा हेतु शस्त्र संचालन की शिक्षा भी देते थे जिसमें विश्वामित्र, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य एवं परशुराम जी जैसे अनेक नामों की बड़ी श्रंखला है, इसीलिए हिंदू धर्म के प्रत्येक देवी-देवताओं के हाथों में शस्त्र एवं शास्त्र दोनों ही सुशोभित होते हैं कि धर्म एवं प्राणों की रक्षा के लिए शस्त्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा आवश्यक है किंतु इस युग में इसका निर्वाह केवल खालसा पंथ द्वारा स्थापित सिख धर्म में ही अधिक किया जाता है क्योंकि गुरु गोविंद सिंहजी ने धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाए थे परन्तु इसके अतिरिक्त हिंदू धर्म में भी कुछ गुरु अथवा सन्यासी परंपरा में आज भी शस्त्रों का त्याग नहीं किया गया है।
उक्त गुरु परंपरा के अतिरिक्त मध्यकाल में अनेक गुरु ,ज्ञान एवं भक्ति के क्षेत्र में प्रवृत्त हुए जिसमें जगतगुरु शंकराचार्य ,बुद्ध एवं महावीर इत्यादि का स्मरण किया जाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट दिखाई देता है कि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर केवल आश्रमों, गुरुद्वारों, मठों एवं मंदिरों में ही गुरु पूजा या सम्मान समारोह आयोजित कर यथा योग्य दक्षिणा -प्रदक्षिणा तथा वस्त्र इत्यादि प्रदान किए जाते हैं, किंतु यहां यह भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है कि आधुनिक युग के गुरु जो पायजामा, पेंट अथवा जींस- टी शर्ट इत्यादि पहनते हैं उन्हें भी गुरुजी नाम से ही संबोधित किया जाता है किंतु गुरु पूर्णिमा के अवसर पर उनका स्मरण तक नहीं किया जाता तो क्या स्वरूप या वेशभूषा बदलने से गुरु की महत्ता कम हो जाना चाहिए? माना कि प्राचीन काल में गुरु 4 वेद 6 शास्त्र 18 पुराण एवं 12 उपनिषद के अतिरिक्त कई विद्याओं के ज्ञाता थे तो, क्या इस युग में भी जींस टीशर्ट पहनने वाले गुरुजी अपने अपने क्षेत्र और विषय में पारंगत होकर विश्व प्रसिद्ध नहीं है? यद्यपि अंग्रेजी शासन ने उन्हें टीचर या प्रोफेसर कह कर संबोधित किया गया किंतु संबोधन या शब्द बदल जाने से गुरु के महत्व को कम आंकना क्या उचित होगा? जबकि स्वयं दत्तात्रेय भगवान ने अपने 24 गुरुओं में कबूतर, कुरकुर पक्षी, तथा वैश्या तक को अपना गुरु माना तथा उनसे भी ज्ञान प्राप्त किया तो क्या जींस टी शर्ट पहनने वाले गुरुजनों का महत्व उनसे भी कम आंकना उचित कहां जा सकता है?
आज भी पेंट शर्ट अथवा जींस टीशर्ट पहनने वाले अनेक गुरुजी आज के साधु सन्यासियों और प्रवचनकारों तुलना में बहुत अधिक जानकार है तथा टेक्नोलॉजी ,ज्ञान, विज्ञान और धर्म शास्त्र के ज्ञाता भी है और उनके द्वारा बड़े बड़े ग्रंथ तथा पुस्तकों की रचना भी की गई है इसलिए एक विशेष वेशभूषा के साधु संत प्रवचनकार हमारे लिए सम्माननीय एवं पूजनीय है तो जींस टीशर्ट पहनने वाले शिक्षकों का भी सम्मान गुरु पूर्णिमा पर किया जाना चाहिए।
अतः इस लेख के माध्यम से समाज के सक्षम वर्ग के सामने उक्त विचार प्रस्तुत करते हुए यह आग्रह है कि इस आधुनिक युग में जब सब कुछ बदल रहा है तो उसी धारा में टीचर या प्रोफेसर की वेशभूषा, प्रवृत्ति, प्रकृति शिक्षा का पैटर्न, लोकाचार इत्यादि सब बदलता जा रहा है इसलिए इस युग के अनुरूप उन्हें भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर ‘‘गुरु‘‘ के रूप में स्वीकार करके सम्मान इत्यादि के आयोजन होना चाहिए यद्यपि वर्तमान समय में विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के लिए यह अत्यंत कठिन है कि किस-किस गुरु का सम्मान करें? क्योंकि उनके जीवन में उन्होंने अनेक गुरुजनों से शिक्षा प्राप्त की हैं इसलिए इसमें से चयन करते हुए अपने सबसे अधिक फेवरेट गुरुजी के सम्मान का कार्यक्रम किया जा सकता है यहां यह पुनः स्मरण रखना चाहिए की वेशभूषा के परिवर्तन से ज्ञान विद्वता त्याग एवं तपस्या का कोई संबंध नहीं रहता है अनेक बार एक विशिष्ट वेशभूषा के गुरुजनों से अधिक पेंट शर्ट और टीशर्ट पहनने वाले गुरुजनो के पास भी बहुत कुछ भंडार होता है।
रमेशचन्द्र चन्द्रे

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