कोविड -19-"अंधेरा और उम्मीद का सूरज
दुनिया के तमाम देश इस समय वैश्विक
महामारी कोविड -19की गिरफ्त में हैं. कोविड का मतलब 'कोरोना वायरस डिसीज 'और 19इसलिए क्योंकि इसका
पहला प्रकरण दक्षिणी चीन मे हुबई प्रान्त के सबसे बड़े औद्योगिक और व्यावसायिक
महानगर वुहान में दिसंबर 2019में प्रकाश मे आया| वास्तविक रूप से देखा जाय तो 'कोरोना 'एक वायरस ना होकर 'वायरस 'का एक सयुंक्त समूह
है | इस वायरस समूह से फैलने वाले रोग अलग अलग होते है| यह वायरस इसके पहले वर्ष 2002मे 'सार्स 'नामक बीमारी फैला चुका है| सार्स नामक यह बीमारी उस समय लगभग 40से अधिक देशों में फैली और कई लोगो को
अपनी गिरफ्त मे ले लिया था| 2002मे इसका स्वरुप इतना विकराल और भयावह
नहीं था, किन्तु फिर भी उस समय 1000से अधिक लोग काल कवलित हो गये थे|
कोविड -19 की उत्पत्ति को
लेकर पुरी दुनिया में धुंध इतनी ज्यादा है कि 'जितने मुँह उतनी बात 'वाली कहावत याद आती
है| स्वयं चीन और उसके समर्थक देशों ने
इसके लिए दक्षिणी चीन और विषेकर वुहान शहर के सी -फ़ूड मार्केट 'को वजह बतलाया है| कतिपय वैज्ञानिको का सोचना है की इसके लिए दक्षिणी चीन के
निवासियों की भोजन अभिरुचियाँ जिम्मेदार है| जहाँ विभिन्न प्रकार के सी फुड के साथ चमगादड़ो का सूप तथा उसका
मांस मुख्य भोजन के रूप में बहुतायत में प्रयुक्त होता है| अमरीका तथा कई पश्च्यात देशों सहित दुनिया के अधिकांश राष्ट्रों
का यह विचार है की यह चीन के वुहान शहर मे स्थित सबसे बड़ी 'बायोलॉजिकल लैब 'मे कत्रिम रूप से
तैयार किया गया 'वायरस 'है, जिसे चीन "जैविक हथियार " के रूप मे प्रयुक्त करना चाहता
था, किन्तु किसी मानवीय असावधानी या त्रुटिवश प्रयोगशाला की सीमाएं और
मर्यादाएं लाँघकर बाहर आ गया|
दिसंबर 2019 से लेकर मध्य फरवरी
2020तक के दौर मे चीन
लगातार दुनिया और "विश्व स्वास्थ्य संगठन " (डब्ल्यू. एच. ओ. )जैसी मानव
हितैषी वैश्विक संस्था से न केवल पर्दादारी की बल्कि असत्य और भ्रामक जानकारियां
परोसी| दिसंबर -2019के अंतिम सप्ताह मे
वुहान प्रयोगशाला के प्रमुख चिकित्सा वैज्ञानिको मे से एक डॉ. ली. लियांग ने इस
वायरस से पीड़ित (ग्रसित )सात मरीजों एवं वायरस का भी खुलासा किया| डॉ. ली. लियांग का यह खुलासा चीन जैसे 'लौह द्वार की नीति '(iron door policy. )वाली राज व्यवस्था को कैसे हज़म होती?.
चीन प्रशासन ने डॉ. ली. लियांग. को
वायरस से संक्रमित बताते हुए 12जनवरी को चिकित्सालय मे भर्ती किया तथा 7फरवरी, 2020की रात 2बजकर 58मिनिट पर मृत घोषित
कर दिया| चीन के विषय मे यह कुछ ऐसे तथ्य और
प्रमाण है जो चीन की नियत मे खोट है इस बात को साबित करतें है|
चुंकि अभी तक इस बीमारी का कोई इलाज
नहीं तलाशा जा सका है, अतः दुनिया के तमाम देश इससे बचाव के लिए सामुदायिक उपकरणों को
अपनी ढाल बना रहें है| भारतीय प्रधानमंत्री ने भी समय रहते
अपनी राजननीतिक इच्छा शक्ति और इस सनातन राष्ट्र की एक सौ तीस करोड़ की जनता के
सामाजिक अनुशासन पर भरोसा जताते हुए'लॉक डाउन 'और सोशल डिस्टेंस
जैसे क़दमों को इस संक्रमण के खिलाफ हथियार बनाया है|
इतने बड़े राष्ट्र मे लॉक डाउन का
निर्णय लागू करने के पूर्व प्रधानमंत्री जी ने बड़ी चतुराई से देश की जनता की
मनोभूमि को तैयार करने के लिए 'मास्टर स्ट्रोक 'के रूप मे रविवार,
22मार्च का दिन चुना और एक मार्मिक अपील
करते हुए सुबह 7से रात्रि 9बजे तक 'जनता कर्फ्यू 'का आव्हान किया| इतने विशाल देश मे यदि कुछ अपवादों
को यदि नज़र अंदाज़ कर दिया जाय तो 'जनता कर्फ्यू 'का प्रयोग सफल रहा
ऐसा कहा जा सकता है| दुनिया के अनुभवों और शोध से यह बात
साबित हो चुकी थी कि कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने का फिलहाल एकमात्र उपाय
"सोशल डिस्टेंसिंग "(सामाजिक दूरी )है|
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार
24मार्च को रात 8बजे राष्ट्र के नाम
अपने इस दूसरे सम्बोधन मे 21दिनों के लिये 24मार्च की मध्य रात्रि से लॉक डाउन का एलान कर दिया| प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सम्बोधन मे यह स्पष्ट कर दिया कि यह
लॉक डाउन एक तरह का कर्फ्यू ही है कोरोना संक्रमण की भयावह स्थिति को भाँपते हुए
लॉक डाउन के प्रथम चरण समाप्त होने के एक दिन पूर्व ही देश के सभी राज्यों के
मुख्यमंत्रियों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रमुखों से किये गए विचारोपरांत लॉक
डाउन 19दिवसीय द्वितीय चरण घोषित किया जो 3मई तक जारी है|
भारतवर्ष जैसे बड़े और 130करोड़ की आबादी वाले
राष्ट्र में लॉक डाउन को एक माह से अधिक का समय गुजर गया है| विकासशील राष्ट्र होने की उसकी अपनी अलग चुनौतियां है| तमाम उपलब्धियों और सफलताओं के पश्चात भी हमें यह खुले ह्रदय से
स्वीकार करना होगा कि 2015-16से आर्थिक मोर्चे या यूं कहें कि आर्थिक विकास की दर पर भारतीय
अर्थव्यवस्था लगातार पीटती जा रही है| 2.72लाख करोड़ अमरिकन डॉलर वाली यह अर्थव्यवस्था 4.2प्रतिशत की विकास
दर पर है| लॉक डाउन के चलते उद्योग -धन्धे, कल कारखाने, व्यापार -व्यवसाय
सब कुछ ठप्प पड़ गये है जो आने वाले दिनों के लिए कई गंभीर आर्थिक चुनौतियों को खड़ा
करेंगी|
आर्थिक चुनौतियों के अतिरिक्त इस एक
माह के लॉक डाउन में कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियां भी मुँह बाए खड़ी हो रही
है| यूरोप और अन्य पश्च्यात्य देशों की
तुलना में हमारा सामाजिक तानाबाना या यूं कहें कि हमारे यहाँ की सोशल इंजीनियरिंग
थोड़ी अलहदा है| इस देश की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा
किसान, मजदूर, और कृषि मजदूरों का है जो रोज़ कुँआ खोदता है और रोज़ अपनी प्यास
बुझाता है| कोरोना वायरस के संकट से निपटने के
लिये यद्पि मोदी सरकार ने 1लाख 70हजार करोड़ रूपये के राहत पैकेज की घोषणा करके देश के मजदूरों, किसानों के साथ
समाज के अन्य तबकों को न केवल आर्थिक संबल प्रदान किया है अपितु उन्हें यह भरोसा
दिलाने का भी प्रयास किया है कि संकट की इस घड़ी में वह सब किया जायेगा, जो संभव है|
कोरोना संकट और लॉक डाउन के कारण
भारतीय जनमानस मे हताशा, भय, असुरक्षा, कुंठा और गंभीर नैराश्य की भावनाये बढ़ती जा रही है| जिसके फलस्वरूप जीवन मूल्यों और जिन्दगी से शिकायतें भी बढ़ती जा
रही है, कि यह वह जिंदगी नहीं है, जो हम जीना चाहते हैं| ऐसा प्रतीत होने लगा है कि सुख का तिनका होने की हमारी छोटी सी आस
पर किसी ने दुखों का पाषाण लाद दिया है| दुःख का स्रोत मन है, मनोवैज्ञानिक शोधकर्ताओं का कहना है
की दुःख संक्रमण की तरह फैलता है, अतः दुःख को परिभाषित करना कठिन है क्यों की यह व्यक्ति के जैविक
गुणों, सामाजिक परिवेश, आर्थिक परिस्थिति, शारीरिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक चिंतन पर निर्भर करता है| प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अब्राहम मैस्लो तथा सिग्मंड फ्रायड का
मानना है कि व्यक्ति जिसे सुख कहता है वह कुछ आवश्यकताओ के संतोष का नाम है|
सबसे अहम् सवाल यह है की इतनी हताशा, तृष्णा, अंधकार और नैराश्य
के बीच जीवन को सामान्य कैसे रखा जाए| यह सब इसलिये भी हो रहा है कि हम प्रक्रिया नहीं, परिणाम के कोण पर
खड़े होकर हम चीजों को देख रहें है | हमें यह बोध होना चाहिए कि मानव जाति किन संकटों, पीड़ाओं और दुखों से
लड़ती हुई आज भी बची हुई है | दरअसल खुशियों की चाबी हमारे खुद के
पास है, यह हम पर निर्भर करता है की हम इसका उपयोग कैसे करते है | जिंदगी की रेस में हम सबने अपनी कई इच्छाओं, आशाओ, आकांक्षाओ और
मूलभूत प्रवत्तियो को कहीं गहरे दफ़न कर दिया है | संक्रमण के इस काल को ईश्वर के द्वारा प्रदत्त अवसर के रूप मे
सकारात्मक ढंग से स्वीकार करें और अपने आपको आधात्म से जोड़े | आध्यात्मिकता का किसी धर्म, जाति, संप्रदाय, दर्शन (Philosophy)या मत से लेना देना नहीं है | आध्यात्मिकता का अर्थ है आप अपने अंदर से कैसे है, भौतिक जीवन से परे
जीवन की अनुभूति करना | हम हिन्दुस्तानियों के घर में एक ना
एक धर्म ग्रंथ जरूर है | समय का सदुपयोग कीजिये और इन्हे नयी
दृष्टि, नए परिप्रेक्ष्य मे एक बार खंगालिए तो सही !लॉक डाउन के खाली वक्त
में अपनी अभिरुचियों अनुसार कभी अपने दफ़न किये गए शौकों को कॉफिन से वापस बाहर निकालिये
और नए सिर से हाथ आजमाइए, शायद यह निराशा, हताशा और अवसाद काफ़ूर हो जाए !.
3मई के बाद भी लॉक डाउन कितना लम्बा और कितनी छूट के साथ चलेगा यह
सब कोरोना वायरस के संक्रमण के विस्तार उसकी तीव्रता जैसी अन्यान्य बातों पर
निर्भर करता है | फिलवक्त हमें कोरोना को यदि हराना है
और जल्दी बाहर घूमने फिरने के लिए सड़क पर निकलना है तो इन "सात -'स ' "का बड़ी शिद्दत से
पालन करना होगा --
1सोशल डिस्टेंसिग 2.सेल्फ कंट्रोल. (आत्म नियंत्रण )3.सकारात्मक संकल्प. 4.सहयोग. 5.समन्वय. 6.संवाद. 7.सहभागिता. (शासन
/प्रशासन की अपेक्षानुसार ).
लॉक डाउन समाप्त होने के बाद भी जीवन
इतना आसन नहीं होगा, क्योंकि इस बार हमारा मुकाबला कोविड -19नामक अदृश्य, छद्म,बहुत ही खतरनाक, और चालाक वायरस के
साथ है | हमें एक स्वच्छ, सतर्क, जागरूक और सात्विक
जीवनशैली को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ना होगा | अपने व्यक्तिगत तथा सार्वजानिक जीवन मे हमें स्वछता और सतर्कता के
वे सारे मापदंड जिनका पालन हम अभी कर रहें है का आगे भी पालन करना होगा |
कोविड -19.के संक्रमण के इस
दौर में संघर्ष की प्रक्रिया से ही सुख उपजेगा | यह विचार हम सबका विचार नहीं बन जाता तब तक इस संक्रमण पर विजय
नहीं पायी जा सकती | आलेख के अंत में प्रसिद्ध गीतकार
प्रसून जोशी की कविता कि पंक्तियाँ मौज़ू नज़र आती है --"कहीं तुम्हारी चिंताओं
की गठरी, पूँजी न बन जाए | कहीं तुम्हारे
माथे का बल, शकल का हिस्सा न बन जाए | जिस मन में उत्सव होता है, वहां कभी भी हार नहीं हैl लक्ष्य ढूंढ़ते है
वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है Il.
मन के अंधेरों को हटाकर सिर्फ एक बार
उस पार झांके, जहाँ उम्मीद का सूरज हम सब की प्रतीक्षा मे है...... ज़िन्दगी के
खूबसूरत सफ़ों पर उम्मीद की किरणें उतरने दें | आमीन.....

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