दलित उत्थान के प्रवर्तक डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर एक भावांजलि
( डॉ. रवींद्र कुमार सोहोनी, प्राध्यापक)
मनुष्य स्वभावतः एक अनुकरण शील प्राणी है। आदर्श अगर हमारे सामने हो तो हम वैसा ही बनने का प्रयास करने लगते हैं। आदर्श के अभाव में मनुष्य के जीवन में एक भटकाव सा आने लगता है। दलित वर्ग में उत्पन्न होने के कारण बाबासाहेब आंबेडकर को बाल्यकाल से लेकर जीवन के उत्तरार्ध तक कठिन संघर्ष का सामना करना पड़ा । भारतवर्ष की सामाजिक संकीर्णता के ढांचे ने उन्हें कई अर्थों में विद्रोही व्यक्तित्व का स्वामी बना दिया, दलितों के प्रति सामाजिक उपेक्षा के भाव के कारण कबीर जैसा फक्कड़, महात्मा ज्योतिबा फुले जैसा शांत क्रांतिवीर और महात्मा गौतम बुद्ध जैसा प्रणम्य आपके आदर्श बन गए। ज्योतिबा फुले के सामाजिक क्रांति के उपकरणों, कबीर की अखड़ता और फकड़ता के साथ गौतम बुद्ध की विनम्रता और सहनशीलता ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को न केवल दलितों की मशाल अपितु उनका मसीहा बनाने में महती भूमिका का निर्वहन किया। आज अलग-अलग राजनीतिक दलों और समूह के बीच बाबासाहेब अंबेडकर की विरासत को लेकर एक घमासान सा छिड़ा प्रतीत होता है। निसंदेह और निर्विवाद रूप से हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय संविधान के प्रमुख रचयिता डॉ बाबासाहेब अंबेडकर के सद्प्रयत्नों के फलस्वरुप ही आजादी के पश्चात एक मजबूत केंद्रीय सत्ता वाली लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था की स्थापना भारतवर्ष में संभव हो पाई। डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित राजनीतिक दल रिपब्लिकन पार्टी भले ही वर्तमान समय में अप्रासंगिक सा हो गया है, किन्तु उनकी विरासत जिंदा है और फल फूल रही है। वोट बैंक की राजनीति के फलस्वरूप सामाजिक न्याय समानता का विचार लाखों-करोड़ों दलितों और पिछड़ी जातियों को एकजुट करने का शक्तिशाली हथियार बन गया है।बसपा जैसे राजनीतिक दलों ने डॉ. अंबेडकर को देवता जैसी छवि दे दी है।
उनकी जरा सी आलोचना भी हिंसक प्रतिक्रिया का कारण बन सकती है। उपर्युक्त दोनों( देवता एवं हिंसक प्रतिक्रिया )के परिप्रेक्ष्य में हमें डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा दी गई चेतावनीयों को ध्यान में रखना होगा। 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा की आखिरी बैठक में डॉ. आंबेडकर द्वारा दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में राष्ट्र को दो खास प्रवृत्तियों के प्रति आगाह किया था। उन्होंने कहा था कि-धर्म में भक्ति भले ही मोक्ष का रास्ता हो, लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजा निश्चित रूप से पतन का रास्ता है, जो अंततः तानाशाही की तरफ जाता है। इसी ऐतिहासिक भाषण में उनकी दूसरी महत्वपूर्ण टिप्पणी थी जहां संवैधानिक तरीके खुले हो वहां असंवैधानिक तरीकों का कोई तर्क नहीं हो सकता। ये तरीके और कुछ नहीं, बल्कि अराजकता का व्याकरण है जिन्हें जितनी जल्दी छोड़ दिया जाए हमारे लिए उतना ही बेहतर है। केवल अंबेडकरवादी ही नहीं बल्कि हम सबको यह ध्यान में रखना होगा की हमारी नाराजगी संवैधानिक परिधि से बाहर निकल कर अराजकता का व्याकरण ना बन पाए, अन्यथा हम चाहे अनचाहे उस संवैधानिक व्यवस्था पर कुठाराघात कर देंगे जिसे बनाने में डॉ बाबासाहेब अंबेडकर का अप्रतिम योगदान है। डॉ बाबासाहेब अंबेडकर ने सामाजिक विषमताओं, विसंगतियों और प्रवंचनाओं को जिस शिद्दत से उजागर किया वह स्तुत्य और प्रणम्य है। सामाजिक आर्थिक क्रांति के प्रणेता दलितों के मसीहा राष्ट्र नायक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का योगदान अविस्मरणीय है। जन्म जयंती के शुभ अवसर 14 अप्रैल को यह भावभीनी भावांजलि सादर अर्पित है ।
उनकी जरा सी आलोचना भी हिंसक प्रतिक्रिया का कारण बन सकती है। उपर्युक्त दोनों( देवता एवं हिंसक प्रतिक्रिया )के परिप्रेक्ष्य में हमें डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर द्वारा दी गई चेतावनीयों को ध्यान में रखना होगा। 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा की आखिरी बैठक में डॉ. आंबेडकर द्वारा दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में राष्ट्र को दो खास प्रवृत्तियों के प्रति आगाह किया था। उन्होंने कहा था कि-धर्म में भक्ति भले ही मोक्ष का रास्ता हो, लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक पूजा निश्चित रूप से पतन का रास्ता है, जो अंततः तानाशाही की तरफ जाता है। इसी ऐतिहासिक भाषण में उनकी दूसरी महत्वपूर्ण टिप्पणी थी जहां संवैधानिक तरीके खुले हो वहां असंवैधानिक तरीकों का कोई तर्क नहीं हो सकता। ये तरीके और कुछ नहीं, बल्कि अराजकता का व्याकरण है जिन्हें जितनी जल्दी छोड़ दिया जाए हमारे लिए उतना ही बेहतर है। केवल अंबेडकरवादी ही नहीं बल्कि हम सबको यह ध्यान में रखना होगा की हमारी नाराजगी संवैधानिक परिधि से बाहर निकल कर अराजकता का व्याकरण ना बन पाए, अन्यथा हम चाहे अनचाहे उस संवैधानिक व्यवस्था पर कुठाराघात कर देंगे जिसे बनाने में डॉ बाबासाहेब अंबेडकर का अप्रतिम योगदान है। डॉ बाबासाहेब अंबेडकर ने सामाजिक विषमताओं, विसंगतियों और प्रवंचनाओं को जिस शिद्दत से उजागर किया वह स्तुत्य और प्रणम्य है। सामाजिक आर्थिक क्रांति के प्रणेता दलितों के मसीहा राष्ट्र नायक डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का योगदान अविस्मरणीय है। जन्म जयंती के शुभ अवसर 14 अप्रैल को यह भावभीनी भावांजलि सादर अर्पित है ।

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