Virtues earned by misdeeds are destroyed in the moment
श्री तीन छत्री बालाजी धाम में आयोजित हनुमन्त कथा के पंचम समापन दिवस पर पू.पं. श्री दशरथ भाईजी ने कहा कि मन में धन कमाने और उसे बढ़ाने की जैसी मन में प्रबल इच्छा होती है वैसी ही प्रबल इच्छा भगवान के भजन को बढ़ाने की भी होनी चाहिये परन्तु भजन केेवल तोता रटन्त नहीं सो टंच सोने की तरह खरा होना चाहिये अर्थात प्रथम पूर्ण दृढ़ श्रद्धा विश्वास और भाव से होना चाहिये साथ ही ज्यों ज्यों भक्ति भजन बढ़ेगा सर्वत्र प्रशंसा-ख्याती भी होने लगेगी परन्तु उसका अभिमान नहीं होना चाहिये।
ज्यों-ज्योें पद-प्रतिष्ठा-पैसा बढ़े फलदार वृक्ष की शाखा की तरह सबके प्रति विनम्र होकर नीचे झुकते चले जाना चाहिये।
भजन यदि ठीक हुआ तो जीवन में चाहे जैसी कठिन परिस्थिति क्यों न आ जावे, भजन आपकी सहायता करने खड़ा हो जायेगा। कठिन से कठिन परिस्थिति भजन के प्रभाव से आपको विचलित नहीं कर सकेगी।
लंका प्रवेश से पहले और प्रवेश के बाद भी अशोक वाटिका में राक्षसों से सामना रावण का पूछ में आग लगवाना आदि सामने आये परन्तु हनुमानजी के पास ‘‘राम नाम’‘ रसायन मुख में होने से बाल भी बांका नहीं हुआ और सीता की खोजकर सकुशल राम के पास लौट आये।
रामायण में हनुमानजी मसक के समान रूपधारण करके गये तो मुंदरी कहां रखी होगी। मसक को संस्कृत में माजरी बिल्ली भी कहा गया है-साथ ही हनुमानजी को अष्ट-सिद्धी नवनिधी का वरदान था। मुंदरी भी अलोकित थी चाहे जैसा छोटा-बड़ा रूप हो सकता था, इसलिये कुछ भी असंभवन नहीं था।
हनुमानजी को लंका के प्रथम गेट (दरवाजे) पर रक्षक लंकिनी ने हनुमान को चोर कहकर रोकना चाहा- हनुमान ने कहा सबसे बड़ा चोर तो लंका में है जो अकेली मॉ सीता को चुरा लाया उस चोर को क्यों नहीं पकड़ा परन्तु लंकिनी ने जब नहीं जाने दिया तो हनुमानजी ने महिला जानकर मारा तो नहीं परन्तु मुक्का नहीं हाथ की साधारण मुट्ठी जैसे ही मारी उसके मुंह से रक्त की धार बह निकली। परम् राम भक्त हनुमान के हाथ का स्पर्श होने का चमत्कार यह हुआ कि जो दूषित-विकारित रक्त था जो बाहर आ गया और उसकी बुद्धि इतनी शुद्ध सात्विक निर्मल पवित्र हो गई कि वह सन्त बनकर हनुमान से सत्संग की महिमा का बखान करने लगी। सत्संग की महिमा-प्रभाव का जितना उत्कृष्ट उत्तम उदाहरण लंकिनी ने दिया वैसा आज तक कोई नहीं दे पाया है- लंकिनी कहती है-तातस्वर्ग-अपवर्ग सुख धरिये तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिली जो सुख लव सत्संग।।’’ कितना अद्भूत उदाहरण दिया एक राक्षसी ने एक प्रभु भक्त का स्पर्श पाकर कि हे तात तराजू के एक पलड़े में स्वर्ग-अपवर्ग अर्थात स्वर्ग से लेकर अपवर्ग (धरती-आकाश-पाताल-मोक्ष) आदि के सुख आनंद को रख दिया जावे और दूसरे पलड़े में घंटे-दो चार घंटे का नही मात्र पल-क्षण किये गये सत्संग को रख दिया जावे तो एक पल के सत्संग के पलड़े की बराबरी समस्त सुख नहीं कर सकेंगे और सत्संग का पलड़ा भारी रहेगा। बाद में सन्त लंकिनी ने हनुमान का मार्ग ही नहीं रोका बल्कि आशीर्वाद भी दे दिया- ‘‘प्रवेशीनगर किजे सब काजा। हृदय राखी कोसलपुर राजा।’’
रात्री को सोते वक्त आप टी.वी., सीरियल, समाचार अथवा पिक्चर देखते-देखते सोये अथवा शास्त्रों का स्वाध्याय और भजन, भगवान के नाम स्मरण करते-करते सोये यह प्रातः जैसे ही नींद खुली मालूम हो जायेगा। यदि संसार का स्मरण करते-करते सोये तो मन मस्तिष्क वह विचार दृश्य उभरेगा और यदि भगवान के जिस नाम-मंत्र का स्मरण करते सोये वह मन में आकर मुख में जिव्हा पर आ जायेगा, इसलिये भगवान का स्मरण करके सोना चाहिए।
हनुमानजी को लंका में बड़ी विसंगति देखने को मिली। रावण और राक्षसों के जिन निवास स्थान को मंदिर कहा जाता था उनमें भोग मिला और जिस विभीषण के निवास को मंदिर नहीं भवन कहा गया वहां योग और भक्ति के दर्शन हुए।
मानव तन पाना बहुत ही दुलर्भ है। इसे महोत्सव मानकर प्रतिपल आनन्द मनाना चाहिये। रात दिन नीरस समझकर व्यर्थ गंवाना नहीं चाहिये।
बड़ी मेहनत से किये गये सत्कर्म पुण्य कार्य दुष्कर्म करने पर एक क्षण में उसी प्रकार नष्ट हो जायेंगे जैसे दूध भरे बड़े पात्र में यदि 1 बूंद खटाई पड़ जाने पर वह फट जायेगा। मिश्री इलाचयी मिली रबड़ी खाने पर यदि ऊपर से लहसुन की 1 कली खा गये तो डकार आने पर डकार रबड़ी की नहीं लहसुन की ही आयेगी।
जीवन का दूसरा नाम ही समस्या-परेशानियां, कष्ट-दुःख, कठिनाईयां, प्रतिकूल परिस्थितियां आने पर घबराना नहीं चाहिये बल्कि मॉ जानकी की तरह हिम्मत से सामना करते हुए धैर्य के साथ अनुकूलता की प्रतिक्षा करनी चाहिये।
योगी और भोगी की पहचान परिचय बाहरी परिवेश से नहीं होता। राजा जनक बाहर से चाहे गृहस्थी-योगी दिखते थे परन्तु भीतर से योगी थे जिससे उन्हें राम के दर्शन करने अयोध्या नहीं जाना पड़ा , राम स्वयं चलकर उनके पास आये परन्तु वर्तमान काल में जो बाहर से तो योगी का भेष धारण कर लेते है परन्तु भीतर से पक्के भोगी होते है। जिन्हें राम दर्शन देने नहीं आते बल्कि उन्हें जेलों के दर्शन करने जाना पड़ रहा है। ऐसे ढांेगी पाखण्डियों से विशेषकर माताओं बहिनों को बचकर रहना चाहिये जिससे बाद में पछताना नहीं पड़े।
साहित्य प्रेमियों के लिये गोस्वामी तुलसीदारजी रचित रामचरित मानस ऐसा अद्भूत ग्रंथ है जिसकी चौपाईयों में नौरसों का समावेश है।
हनुमन्त तत्व की विशेष विवेचन हनुमान की तरह भगवान के चरणों में अनुराग के लिये प्रथम विवेक को माध्यम बनाकर पंच दिवसीय कथा का कल 30 जनवरी को समापन हुआ।
उल्लेखनीय कि कथा नगर से दूर नागारूण्डी खानपुरा पर आयोजित होकर तथा प्रारंभ के 3 दिनों में भयंकर ठण्ड के बावजूद नगर के दूरस्थ अभिनंदन-किटीयानी, नरसिंहपुरा आदि मोहल्लों, बाहर के अलावा गांवों से आकर सैकड़ों की बड़ी संख्या में महिला पुरूष, श्रोताओं ने भाग लिया।
आज 1 फरवरी की सायं 6 बजे से अंतर्राष्ट्रीय कलाकार बाबा सत्यनारायण मोर्या मुम्बई द्वारा चित्र, संगीत कविता से युक्त देशभक्तिपूर्ण मनोरंजक कार्यक्रम सुनो रहे नाम कहानी प्रस्तुत किया जाएगा।
उपस्थित रहे- राधेश्याम चाष्टा, डॉ. दिनेश तिवारी, राजेश नामदेव, कुबेरकांत त्रिपाठी, गोपाल भट्ट, पंकज शर्मा, रमेश उपाध्याय, राजेन्द्र चाष्टा, नन्दकिशोर शर्मा, शिवराजसिंह राणा, मनीष भावसार, विनय दुबेला, राजेश चौहान, नानालाल अटोलिया, पुलकित पटवा, सुशील शर्मा, धीरज पाटीदार, लोकेश नामदेव, ओमप्रकाश मुंदड़ा, अशोक भावसार, दृष्टानन्द नैनवानी, रक्षा जैन, प्रियंका जैन, शशि झलोया, नर्मदा मोगिया, कृष्णा तिवारी आदि बड़ी संख्या में धर्मालुजन ने उपस्थित होकर धर्मलाभ लिया।
संचालन डॉ. रमेशचन्द्र तिवारी ने किया।

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