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पापी की चर्चा करने, पापी से संबंध रखने वाले को भी पाप का भागीदार बनना पड़ता है-पू. निर्मल चैतन्यजी महाराज(cheitanya mahaaraj )

पापी की चर्चा करने, पापी से संबंध रखने वाले को भी पाप का भागीदार बनना पड़ता है-पू. निर्मल चैतन्यजी महाराज

पू. निर्मल चैतन्यजी महाराज (cheitanya mahaaraj )

मन्दसौर। श्री केशव सत्संग भवन खानपुरा में चातुर्मास कर रहे नर्मदा तट के पूज्य सन्त श्री निर्मलचैतन्यजी महाराज ने भागवत चर्चा में अपराधी-पापी के अपराध-पाप कर्म के फल से बचने के लिये सावधान रहने के लिये भागवत का संदर्भ देकर कहा कि जो पापी से सम्बन्ध  रखता है अथवा किसी पापी की चर्चा-पापी का सम्मान करता है तो चर्चा सम्मान करने वाला भी उसके पाप में उतना ही भागीदार हो जाता है जितना पानी होता है। 

सन्त श्री ने सतयुग-त्रेता-द्वापर तथा कलियुग चारों युगों में कलियुग के संबंध में कहा कि कलियुग में यद्यपी पाप कर्मों की प्रधानता देखने में आती है परन्तु फिर भी कलियुग की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सतयुग में हजारों वर्ष तपस्या करने से त्रेता में अश्वमेघ आदि बड़े-बड़े यज्ञादि करने तथा द्वापर में समाधी-पूजा आदि करने पर जो अभीष्ट फल की प्राप्ती होती थी वह कलियुग में एक तो उम्र कम दूसरे साधन सामग्री में शुद्धता-पवित्रता का अभाव रहने से कलियुग प्रेम से केवल भगवान के नाम का स्मरण मात्र से वह फल प्राप्त हो जाता है जो अन्य तीनों युगों में कठिन तपस्या-यज्ञ-पूजन-समाधी आदि करने पर प्राप्त होता था। 

नाम स्मरण के संबंध में गोस्वामी तुलसीदासजी ने यहां तक कह दिया है कि भगवान का नाम चाहे भाव से चाहे कुभाव से, उल्टा-सीधा, आलस्य से, चाहे जैसे भी लिया जावे उससे कल्याण-मंगल ही होता है। भाव-कुभाव अनख-आल सहूं। नाम जपत मंगल दिखी दसहूं। उल्टे सीधों जपिहीं-धरती परे पर बीज।’’ धरती पर खेत में बोने पर बीज चाहे उल्टा पड़े अथवा सीधा परन्तु पौधा जैसे सीधा ही उगेगा वैसे ही  नाम प्रभाव हमेशा मंगलकारी ही होता है और इसलिये जब व्यक्ति सब ओर से निराश हो जाता है तब वह भगवान की ही शरण में जाता है। 

कलियुग का स्थान प्रथम जुआं-सट्टा-लाटरी, दूसरा मदिरालय, तीसरा लम्पट-पर स्त्रीगमन तथा चौथा हिंसा में बताया गया है वहीं पांचवा स्थान स्वर्ण-सोना बताया गया है परन्तु भागवत में स्वर्ण में भगवान ने अपना निवास भी बताया है। इसलिये कलियुग का निवास सोने में वहीं रहेगा जो उसका सद्ुपयोग-सद्कार्यों-पुण्य कार्यों-परमार्थ में न करते हुए असत कार्यों में दुरूपयोग करेगा।


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