मन्दसौर। श्री तीन छत्री बालाजी धाम पर अंतर्राष्ट्रीय रंगकर्मी कलाकार बाबा सत्यनारायण मोर्य अपने कार्यक्रम समापन दिवस 3 फरवरी को राष्ट्र-परिवार-समाज से संबधित ‘‘सुनो रे राम कहानी’’ के माध्यम से निम्न सूत्र बताये।
जीवन में सुखी रहने का सूत्र यही है कि खुद हंसों, हंसते रहो और दूसरों को भी हंसाओं परन्तु साथ ही काम ऐसा न करो कि दूसरे हम पर हसें।
अच्छी वस्तु दूसरों को देने में कोई शर्म, संकोच नहीं होता। दूध को घर-घर बांटा जाता है परन्तु दारू को घर-घर जाकर नहीं बांट सकते।
भोजन आवश्यक नहीं है, 20 साल से हमारे एक मित्र संजय पटेल ने कुछ नहीं खाया। भोजन में केवल प्रातःकाल एवं सायंकाल एक-एक गिलास दूध का सेवन करते है और दिन भर काम सब करते रहते है।
बांटकर खाने की प्रवृत्ति होना चाहिये इससे दूसरों में प्रेम तथा ईश्वर का आशीष मिलता है। गलत काम अकेले में किया जाता है क्योंकि वह गलत है और अच्छा काम सबके सामने किया जाता है क्योंकि वह अच्छा है। हनुमान चालिसा, सुन्दरकाण्ड, रामचरित मानस का पाठ जितना हो सके मिलकर करना चाहिए।
दुनिया को हम बदलना चाहते है परन्तु अपने को बदलना नहीं चाहते।
राम जब धरती पर आये नल, नील इंजीनियर के रूप में और सभी देवता आ गये यहां तक की कैलाश शंकर भी हनुमान का रूप धारण कर राम की सेवा में उपस्थित हो गये।
शादी में मस्ती खत्म हो गई है यहां तक की बारात में नाचने गाने वाले भी किराये से आते है। हमें हमारे पुराने लोकगीत जिसमें हमारी संस्कृति की झलक मिलती है लुप्त होती जा रही है।
भिण्ड, मुरैना में ही डाकू क्यों पनपते है इसका कारण मध्यप्रदेश का इन सीमाओं से घीरा होना जिससे राज्य में वारदात करने के बाद वह दूसरे राज्य में चले जाते है।
जहां देखों वहीं धृतराष्ट्र एवं आंखों पर पट्टी बांधे गांधारी तथा दूर्यांेधन बैठे है फिर महाभारत नहीं होगा तो क्या होगा।
हम सभी गुण्डों को तो खत्म नहीं कर सकते परन्तु अपने आपका तो सुधार कर गुण्डों से पंगा ले ही सकते है।
गुरूकुल में यही सिखाया जाता था कि आगे-आगे गुरू और पीछे शिष्य चलता था। जैसे आगे-आगे गुरू वशिष्ठ और उनके पीछे राम-लक्ष्मण चलते थे।
बड़ा वह नहीं होता जो खुद के लिये जोड़ता है बल्की बड़ा वही होता है जो दूसरों के लिये छोड़ता हैं।
राष्ट्र से अत्याचार, अनाचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार, गोवध आदि बचाने के लिये हमारे मन में दृढ़ निश्चय होना चाहिए।
पुराना अवतार जाता है तो नया आ जाता है। पुराने का सम्मान हो और पुराने को भी नये से प्रेम से संवाद, मार्गदर्शन देना चाहिए। बड़ों का सम्मान राम से व बड़े कैसे होते है यह दशरथ से सिखना चाहिए। दशरथ दुल्हा राम के पिता और चक्रवर्ती होने के बावजूद राजा जनक से अत्यन्त विनयशील होकर के संवाद और व्यवहार करते है।
साधु संतों, नेताओं तथा व्यापारियों का अपना-अपना काम, अपना-अपना दायित्व है उसमें दूसरांे को टांग नहीं अड़ाना चाहिए।
परशुराम का जब जुलूस निकले तो सभी राजपूतों को माला लेकर परशुराम का सम्मान तथा भक्त रैदास की जब शोभायात्रा निकले तब सबको रैदास समाज का फूल मालाओं से सम्मान करना चाहिए। रैदास का भजन ‘प्रभु जी तुम चंदन हम पानी’ जितने इतने सुन्दर भजन दिये हो उसका सम्मान समस्त मानव समाज का सम्मान है।
रावण ने अभिमानवश पत्नी मंदोदरी और पार्वती ने शंकर की शिक्षा को नहीं माना तो दोनों को उसका फल भूगतना पड़ा। रावण का कुल सहित नाश हुआ और पार्वती को अपने पिता दक्ष के हवन कुण्ड में जीते जी आग में समर्पित होना पड़ा।
तुलसीदास, चाणक्य झोपड़ियों में पैदा होने के बाद भी अमर हो गये है। 7 व्यक्ति आज भी जीवित है बाली, अश्वथामा, हनुमान के अतिरिक्त परसराम भी जीवित है। जो की गोवा के पास महेन्द्र पर्वत पर आज भी तपस्या कर रहे है।
दूल्हा पहले शादी में जनकपुरी में जहां दूल्हा पहले पहुंच गया वहीं राम की बारात बाद में पहुंची। यह अपने आप में एक अनौखी शादी थी। दुल्हन ससुराल में जाते वक्त पहले शिला पर पैर रखकर इसलिये जाती थी कि वह ससुराल में जाकर मजबूत, अडिग व दृढ़ रहे ताकि जीवन में चाहे जैसी विषम परिस्थति क्यों न आये वह उसका हिम्मत के साथ सामना कर सके।
कच्ची मिट्टी से चाहे जो बनाया जा सकता है परन्तु पकाये जाने पर फिर उसमें कुछ परिवर्तन नहीं हो सकता, इसलिये जैसे ही पुत्री बालिग हो अच्छा कुल व वर ढूंढकर शादी कर देना चाहिए।
पहले बच्चों के पेट में कुछ भी गड़बड़ होने पर घर ही दादी मॉ हिंग मसलने से ठीक कर देती थी परन्तु अब बच्चा पैदा होने में देर नहीं लगती और डॉक्टर के पास पहुंच जाते है।
कोई अपनी बच्ची का नाम कैकई नहीं रखता परन्तु समस्त विश्व को आतंकी रावण से मुक्त करने के लिये कैकई ने खुद बदनामी सहन कर राम को वनवास में भेज दिया। राम बन गये तो राम बन गये।
हिन्दू संस्कृति में कभी तलाक प्रथा नहीं रही है पत्नी को पति का साथ इसी प्रकार देना चाहिए जिस प्रकार सीता ने राम का साथ दिया था।
इस अवसर पर श्री मोर्य ने तू जहां-जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा ............. गीत को सुनाया।
रामायण का एक-एक पात्र हमें यह शिक्षा देता है कि हम परिवार में कैसे रहे। राम ही नहीं, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सभी माताएं ही नहीं जंगल में रहने वाला केवट, निषादराज तथा रावण से संघर्ष करने वाला जटायु आदि समस्त पात्र अपने आप में एक रामायण है।
राजा रंक महामण्डलेश्वर सबकी गती एक दिन श्मशान की राख होना है परन्तु काम ऐसा कर जाना चाहिए कि चाहे राख उड़ जाये परन्तु उनका नाम धु्रव की तरह अंतरिक्ष में हमेशा चमकता रहे।


0 Comments
Please do not enter any spam link in the comment box.